Gorakh Bodh

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Nath Ji Messages

Sacchi Shiksha Jankar Kahate Sant Vichar, Addhyatma Vidya Sar Hai Jivan Ka Adhar

Desh, Kal Aru Patrata, Soach Samaj Man Mahin,
Atman Se Dradh Pran Karo, Digo Kadapi Nahin

Teri Doar Guru Ke Hath,
Guru Prem Ke Sath

नाथ पंथ के संस्थापक मछेन्द्रनाथ के सबसे प्रिय शिष्य थे गोरखनाथ। गोरखनाथ प्रायः अपने गुरु मछेन्द्रनाथ से संसार, मुक्ति, वैराग्य तथा साधना को लेकर विचार-विमर्श किया करते थे। उनके इसी संवाद को इस आलेख में दिया गया है।

Gorakh — O Lord (Svami), you are the Master Teacher (Satguru Gosain), and I am but a disciple: may I put a question, which you would kindly reply to and resent not? To start with, what ideal (lacch) should the disciple put before him? Do tell me for you are the true Teacher.

गोरख – हे स्वामी, आप मेरे गुरु है और मैं आपका शिष्य। यदि आपकी अनुमति और अनुग्रह हो तो मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता है? एक साधक (शिष्य) को अपने जीवन में क्या लक्ष्य रखना चाहिए? हे गुरुदेव, मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए।

Macchendra — Let the unattached (awadhu, avadhuta) live at the monastery (hat) or be on the road, resting in the shadow of the trees; he should renounce desire, cruelty, greed, delusion, and the illusion of Samsar (Kama, Krodha, Lobha, Moha and Samsar ki Maya); he should hold converse (gosht) with himself and contemplate the Endless (Ananta); he should sleep little and eat little. In the beginning the disciple should live thus. Thus speaks Macchendra. [2]

मछेन्द्र – एक साधक को अपने जीवन में एक अवधूत की भांति रहना चाहिए। उसे चाहिए कि वह समस्त इच्छाओं से मुक्त रहें, किसी पेड के नीचे कुटिया बना कर उसमें वास करें। वह अपनी समस्त इच्छाओं, लोभ, यश आदि की इच्छा सहित संसार के माया जाल (काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अन्य सांसारिक माया प्रपंचों) को त्याग दें। उसे अपने भीतर ही वास कर अनंत ईश्वर की प्राप्ति हेतु प्रयास करना चाहिए। उसे चाहिए कि वह कम खाएं, कम सोएं। इस प्रकार एक साधक शिष्य को अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए।

Gorakh —  What should he see, what contemplate, and what treat as the essence (sar); with what should he shave his head and with the knowledge of what should he try to cross (the ocean of Samsar)?

गोरख – उसे क्या देखना चाहिए, क्या विचारना चाहिए और उसे किस सार को ग्रहण करना चाहिए। उसे कब अपना सिर मुंडाना चाहिए और किस ज्ञान का आधार लेकर संसार पार करने का प्रयास करना चाहिए?

Macchendra — He should see himself, contemplate the Endless (Ananta), and fix upon Reality as the essence; he should shave his head with (or after receiving) the word of the teacher (Guru ka Shabda), and should cross over with the aid of Divine knowledge (Brahma Gyana). [4]

मछेन्द्र – उसे स्वयं को ही देखना चाहिए, आदि-अंत रहित आत्मा को विचारना चाहिए और वास्तविकता को ही सार रुप में ग्रहण करना चाहिए। अपने गुरु से दीक्षा लेने के बाद ही उसे सिर मुंडाना चाहिए और ब्रह्म ज्ञान के सहारे ही भवसागर को पार करने का प्रयास करना चाहिए।

Gorakh —  What is the teaching (upadesh) of the Guru’s order or doctrine (Ades)? Where does the void (Sunya) reside? Who is the Guru of the word (Shabda)?

गोरख – गुरु का आदेश का उपदेश (सीख) क्या है? शून्य कहां रहता है? और शब्द का गुरु कौन है?

Macchendra — The most wonderful (anupam) is the teaching of the Guru (Ades); the void (Sunya) resides within us and Realisation (parcha or parichaya) is the Guru of the word (shabda). [6]

मछेन्द्र – गुरु का आदेश की उपदेश है। शून्य साधक के अंदर ही है और स्वयं का परिचय ही शब्द का गुरु है।

Gorakh — What is the form (rupa) of the mind (mana)? What is the appearance (akar) of the vital breath (pavana)? What is the direction (disa) of the ten and through which door can the control be effected?

गोरख – मन का स्वरूप क्या है? श्वांस का आकार क्या है? दस दिशाएं कौनसी हैं और किस उपाय के द्वारा इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है?

Macchendra — The void (sunya) is the fore of the mind; the appearance of vital breath (pavan) is invisibility (nirakar); the direction of the ten is unsayable (alekh) and control lies through the tenth door. [8]

मछेन्द्र – शून्य ही मन का स्वरूप है, श्वांस का आकार निराकार है, दशों दिशाओं का वर्णन नहीं किया जा सकता और दसवां द्वार ही इन्हें नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है।

Gorakh — Which is the root (mula) and which the branch (bela)? Who is the Guru and who the disciple; with what essence (tatt) can one go about alone?

गोरख – मूल (जड़) क्या है और शाखा क्या है? कौन गुरु और कौन शिष्य है, किस तत्व के सहारे साधक अकेला अपने मार्ग पर चल सकता है?

Macchendra — Mind is the root and vital breath is the branch; the word (shabda) is the Guru and attention (surat or surta) is the disciple. With the essence called deliverance (nirbana tat) Gorakhnath wanders about, himself in himself. [10]

मछेन्द्र – मस्तिष्क ही मूल है और श्वांस शाखा हैं। शब्द ही गुरु है और ध्यान ही शिष्य है। और खुद को जानना ही वह ज्ञान है जिसके सहारे साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

Gorakh — What is the seed (biraja) and what the field (khetra)? What is direct hearing (satvan)? What is true vision? What is Joga and what is the method (Jugti)? What is liberation (mocch)? And what is salvation (mukti)?

गोरख – बीज क्या है, क्षेत्र क्या है? स्तवन क्या है? दृश्य क्या है? जोग (योग) क्या है और किस उपाय (जुगती) के सहारे किया जाता है? मोक्ष क्या है? और मुक्ति क्या है?

Macchendra — The word (Mantra) is the seed; perception (mati) is the womb or land; and attention (surti) is direct hearing, and discrimination (nirti) is true vision; the ocean (Uram) is Joga and the earth (Dhuram) is the method; light (joti) is liberation and the refulgence (Juala) is salvation. [12]

मछेन्द्र – मंत्र ही बीज है, मति (भाव) ही भूमि है। ध्यान (सूरति) ही स्तवन है, सबसे अलग होना ही (अर्थात निवृत्ति) ही दृश्य है। सागर (उरम) ही जोग है और पृथ्वी (धुरम) ही उपाय है। अखंड ज्योति ही मोक्ष है और ज्योति का प्रकाशपुंज ही मुक्ति है।